भारतीय नौसेना मुख्यालय, नई दिल्ली में तैनात अप्पर डिविजन क्लर्क विशाल यादव (37) को राजस्थान पुलिस की इंटेलिजेंस विंग ने बुधवार देर शाम जयपुर से गिरफ़्तार किया। आरोप है कि यादव ने हाल में सम्पन्न Operation Sindoor से जुड़ी संवेदनशील दस्तावेज़ी जानकारी तथा कुछ रक्षा प्रतिष्ठानों का ब्योरा पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI तक पहुँचाया ।
जांच अधिकारियों के मुताबिक़ यादव पिछले कई महीनों से सोशल मीडिया-चैट के जरिये खुद को “प्रिय शर्मा” बताने वाली पाकिस्तानी हैंडलर के संपर्क में था। डिजिटल फ़ोरेंसिक पड़ताल में उसके मोबाइल फ़ोन से क्लासिफ़ाइड फाइलें, बेस ले-आउट और ऑपरेशन सम्बन्धी संदेश बरामद हुए हैं । प्रारंभिक पूछताछ में पता चला कि यादव को ऑनलाइन गेमिंग की लत के कारण भारी आर्थिक नुकसान हुआ था; उसी तंगी का लाभ उठाकर उसे हनी-ट्रैप किया गया। बदले में उसे क्रिप्टोकरेंसी (USDT) और बैंक खातों के ज़रिये भुगतान मिलता था ।
राजस्थान CID-इंटेलिजेंस ने लंबे सर्विलांस के बाद मंगलवार को उसे पकड़कर जयपुर स्थित Central Interrogation Centre में संयुक्त पूछताछ शुरू की है। शीर्ष पुलिस अधिकारी विष्णुकांत गुप्ता के अनुसार, अभी यह मूल्यांकन किया जा रहा है कि लीक की गई सूचनाएँ कितनी व्यापक थीं और क्या नेटवर्क में अन्य सैन्य या असैनिक कर्मी भी शामिल हैं ।
Operation Sindoor, 7-10 मई 2025 के बीच हुए चार-दिवसीय सैन्य अभियान को लेकर भारत सरकार ने इसे आतंकी ढांचे पर “निर्णायक प्रहार” बताया था। अब उसी ऑपरेशन के गोपनीय ब्योरे बाहर जाने से सुरक्षा एजेंसियाँ चौकन्ना हैं। गृह मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (1923) की सख़्त धाराएँ लागू कर सख़्त सजा का प्रावधान सुनिश्चित किया जाएगा ।
यादव हरियाणा के रेवाड़ी ज़िले का निवासी है और 2014 में नौसेना सेवा में भर्ती हुआ था। परिवार को शुरुआती सूचना दे दी गई है। इस गिरफ्तारी से पहले, राजस्थान में ही एक राज्य कर्मचारी और दिल्ली से जुड़े यूट्यूबर की जासूसी मेंं संलिप्तता सामने आ चुकी है, जिससे पता चलता है कि हाल के महीनों में पाक-नेटवर्क ने सोशल मीडिया हनी-ट्रैप को संगठित तरीक़े से तेज़ किया है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला “सोशल इंजीनियरिंग-आधारित साइबर जासूसी” का ताज़ा उदाहरण है। सेनाओं में निचले/मध्य स्तर के कर्मियों के वित्तीय तनाव, मोबाइल-ऐप्स की निर्बाध पहुंच और डेटा-साझाकरण प्रक्रियाओं की ढिलाई मिलकर राष्ट्रीय सुरक्षा को जोखिम में डालते हैं। विशेषज्ञ अब सोशल मीडिया प्रोटोकॉल और वित्तीय काउंसलिंग तंत्र को और कठोर बनाने की वकालत कर रहे हैं।
भविष्य में अदालत में पेशी और जांच के विस्तृत परिणाम यह तय करेंगे कि नुकसान का दायरा कितना बड़ा था, लेकिन शुरुआती गिरफ़्तारी ने साफ़ कर दिया है कि डिजिटल युग में सूचनात्मक जासूसी का अखाड़ा घर के भीतर से ही खुल सकता है—और इससे निपटने के लिए सैन्य-नागर दोनों मोर्चों पर कड़ा अनुशासन आवश्यक है।