आपने किसी अप्रिय घटना की आशंका होने पर ट्रेन के इमर्जेंसी ब्रेक को लगते देखा और सुना होगा। आपने ट्रेन में नवजात के जन्म की कहानी भी खूब पढ़ी और सुनी होगी। लेकिन क्या आपने किसी नवजात के ट्रेन में जन्म की कहानी पढ़ी या सुनी है। वह भी तब, जब ट्रेन में कोई डॉक्टर या चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध न हो। बात सुनने में थोड़ी हैरान कर रही होगी। लेकिन यकीन मानिए यह बात सच है।
अगरतला-हबीबगंज एक्सप्रेस अपने पूरे रफ्तार में थी और यात्री अपने धुन में। तभी एक महिला की दर्द से कराहने की आवाज आती है और लोगों का ध्यान महिला की ओर आकर्षित होता है। पता चलता है कि महिला गर्भवती है और उसे चिकित्सा सुविधा की जरूरत है। लेकिन कहते हैं कि ईश्वर किस रूप में अपने भक्तों की मदद करने आता है इसका किसी को कभी अंदाजा नहीं होता है। महिला दर्द से परेशान थी और उसे मदद की सख्त जरुरत होती है। तभी मदद के लिए मोहम्मद सोहराब, त्रिभुवन सिंह और सुबेदार गडवा आगे आते हैं। फिर इन तीनों ने मिलकर महिला की डिलीवरी कराई।
बता दें कि गर्भवती महिला को अचानक से दर्द उठता है और जिसके बाद इन तीनों ने ट्रेन में डॉक्टर की तलाश शुरू की। तमाम कोशिश के बावजूद भी उन्हें डॉक्टर नहीं मिला। इसके बाद तीनों ने महिला यात्रियों से कुछ कपड़े इकट्ठा किए और गर्भवती महिला द्रारा बच्चे को जन्म देने में मदद की। जन्म के बाद बच्चे के रोने की आवाज सुनकर कोच में बैठे यात्रियों ने राहत की सांस ली।
नवजात के जन्म के बाद अब गर्भनाल हटाई जानी थी लेकिन इसका किसी को अनुभव नहीं था। इसके बाद फिर तीनों ने चेन खींचकर ट्रेन को रोकने की कोशिश भी की। लेकिन उन्हें किसी भी प्रकार की सफलता प्राप्त नहीं हुई। इसके बाद सोहराब ने मदद के लिए फोन किया लेकिन गार्ड शंकर प्रसाद नजदीक थे तो उन्होंने तुरंत गर्भवती महिला के लिए इमर्जेंसी ब्रेक लगाकर ट्रेन रोक दी।
अगरतला-हबीबगंज एक्सप्रेस को 150 किलोमीटर बाद जलपाईगुड़ी स्टेशन पर रूकना था लेकिन ट्रेन धुपगुड़ी स्टेशन में प्रवेश करने से पहले ही रूक गई। मामले की जानकारी आरपीएफ (RPF) इंस्पेक्टर और स्टेशन मास्टर ( Station Master) को पहले ही दी जा चुकी थी। उन्होंने स्थानीय डॉक्टर को पहले ही मदद के लिए बुला लिया था। डॉक्टर ने तुरंत गर्भनाल निकालकर मां-बच्चे को प्राथमिक उपचार दिया। पूरे प्रकिया में ट्रेन करीबन एक घंटे तक लेट हो गई।
गार्ड शंकर प्रसाद ने कहा कि बच्चे के जन्म से कतई समझौता नहीं कर सकते थे। सोहराब कहते हैं कि मैं न जानता हूं और न ही जानना चाहता हूं कि वह महिला कौन थी। उसकी हालत बिगड़ रही थी, वह बच्चे को जन्म देने की स्थिति में थी। वहां पर मौजूद लोगों में से किसी को भी कोई अनुभव नहीं था लेकिन जान बचाने के लिए किसी को तो कुछ करना था इसलिए यह सब बहुत जरूरी था। वहीं त्रिभुवन कहते हैं कि हमने इंसान होने के फर्ज निभाया।