बॉलीवुड अभिनेता वरुण धवन और आलिया भट्ट की फिल्म कलंक सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। करण जौहर सहित तीन दिग्गज प्रोड्यूसर्स ने इस फिल्म को तैयार किया है। हिट फिल्म ‘2 स्टेट्स’ के डायरेक्टर अभिषेक बर्मन ने 1940 के बैकड्रॉप पर सजी एपिक ड्रामा फिल्म कलंक का निर्देशन किया है। फिल्म की स्टार कास्ट में आलिया और वरुण के अलावा माधुरी दीक्षित, संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा, आदित्य रॉय कपूर जैसे एक्टर्स शामिल हैं।
कहानी: फिल्म कलंक की शुरुआत होती है आजादी से पहले के पाकिस्तान के हुस्नाबाद से। आदित्य रॉय कपूर (देव चौधरी) की पत्नी सोनाक्षी सिन्हा (सत्या) कैंसर से जूझ रही होती हैं और डॉक्टर कहते हैं कि वह एक साल की मेहमान हैं। अपने पति की जिंदगी में खुशियां भरने के लिए सत्या यानी सोनाक्षी सिन्हा आलिया भट्ट (रूप) के पिता से मिलकर एक समझौते का प्रस्ताव रखती हैं। समझौता ये कि रूप उनके घर आकर रहे और बदले में वह रूप की दोनों बहनों की शादी तक पूरी देखभाल करेंगी। रूप के पिता शास्त्रीय संगीत सिखाते हैं। शुरुआत में रूप को ये समझौता मंजूर नहीं होता है लेकिन अपनी बहनों के भविष्य के लिए वह तैयार हो जाती है एक शर्त पर। शर्त ये कि वह देव चौधरी से शादी करके ही उस घर में कदम रखेगी।
रिव्यू: संजय दत्त (बलराज चौधरी) देव चौधरी के पिता हैं और डेली टाइम्स अखबार के मालिक हैं। देव चौधरी उस अखबार से संपादक हैं। देव के घर में आने के बाद रूप संगीत सीखने की इच्छा जाहिर करती है और वह बहार बेगम (माधुरी दीक्षित) के कोठे पर संगीत सीखने जाने लगती है। यहां उसकी मुलाकात वरुण धवन (जफर) से होती है, जो बलराज चौधरी से इंतकाम लेना चाहता है। इस इंतकाम के लिए वह रूप को हथियार बनाता है लेकिन रूप उससे प्यार कर बैठती है।
कहानी में वरुण धवन लाहौर हीरा मंडी के लोहार बने हैं। फिल्म में स्टील की मशीनें लगाने के खिलाफ बगावत की कहानी दिखाई गई है। हीरा मंडी में लोहार अपना काम करते हैं और इसी मंडी में बहार बेगम के कोठे पर गीत-संगीत की महफिलें सजती हैं। अंग्रेज मशीनें लगाकर इस मंडी को बदलना चाहते हैं। देव चौधरी का डेली टाइम्स अखबार मशीनें लगाए जाने का साथ देता है, जिससे नाराज लोहार बगावत कर देते हैं लेकिन वरुण धवन लोहारों का नहीं बल्कि रूप और देव का साथ देता है।
असल जिंदगी की घटनाओं, सितारों की फौज और करण जौहर, साजिद नाडियाडवाला और फॉक्स स्टार स्टूडियोज जैसे तीन दिग्गज फिल्ममेकर्स भी इसकी कहानी को बांध नहीं पाए। इस फिल्म में न तो जफर की बलराज चौधरी को लेकर नफरत स्थापित हो पाई और न रूप की जफर को लेकर मोहब्बत।
इस फिल्म में आदित्य रॉय कपूर और सोनाक्षी सिन्हा के बीच इश्क की झलक है, तो वरुण धवन और आलिया भट्ट के बीच प्यार है। एक पल आदित्य रॉय कपूर और आलिया भट्ट का भी लव एंगल बनता है। अब संजय दत्त और माधुरी दीक्षित का क्या रिश्ता है, वरुण धवन और संजय दत्त की क्या दुश्मनी है और फिल्म के अंत में आलिया भट्ट आखिर किसकी होती हैं, ये जानने के लिए आपको सिनेमाघर जाना होगा।
संगीत और डायलॉग: 2 घंटे 48 मिनट की इस फिल्म में कई गाने हैं जिनसे फिल्म खिंचती हुई नजर आती है। कुछ गाने बेहद शानदार हैं तो कुछ बेवजह डाले गए लगते हैं। फिल्म के कई डायलॉग अच्छे हैं, लेकिन फिल्म आगे बढती है तो कई डायलॉग रिपीट होते नजर आते हैं। ये रिपीटेशन बोरियत में बदल जाती है। माधुरी दीक्षित के डांस में बेहतर कोरियोग्राफी की गुंजाइश दिखाई देती है।
क्यों देखें: आजादी से पहले का नजारा देखना चाहते हैं, आलिया भट्ट की मासूमियत के लिए, संजय लीला भंसाली की फिल्मों जैसे सेट और कॉस्ट्यूम देखने के लिए।
क्यों न देखें: लंबी फिल्में पसंद नहीं हैं तो, इस फिल्म से अधिक उम्मीद रखते हैं तो और ओवर एक्टिंग पसंद नहीं है तो।