दिव्यांग होने का मतलब भीख मांगना नहीं, मिलिए इन दो दृष्टिहीन भाइयों से जिन्होंने इस तरह कमाई शोहरत

कहते हैं जब कुछ कर गुजरने की इच्छा में जाग उठे तो फिर कोई सी भी परेशानी आए वह उस अटल इच्छाशक्ति को डिगा नहीं सकती है। मन की ताकत सबसे बड़ी ताकत होती है। चाहे राह में कितनी भी मुश्किलें आए, शारीरिक परेशानी या जो भी दूसरी परेशाी इन सबको पाक करके जो आगे बढ़कर अपना मुकाम हासिल कर लेता है असल जिंदगी में वही हीरो कहलाता है। आज हम एक ऐसे ही दो भाइयों की बात करने जा रहे हैं जो कश्मीर के श्रीनगर के रहनेवाले हैं।

कश्मीर में दृष्टिहीन दो भाइयों ने अपनी हुनर का कमाल दिखाते हुए एक नई मिसाल पेश कर दी है। 45 वर्षीय गुलाम नबी तेली और 40 वर्षीय मोहम्मद हुसैन दोनों आपस में भाई हैं और बचपन से ही दृष्टिहीन है। इनकी खासियत ये है कि दृष्टिहीन होने के बावजूद ये खूबसूरत और एंब्रॉयडर्ड गद्दे और कंबल डिजाइन करते हैं। इनकी इसी काबिलियत की वजह से इन्हें पूरे श्रीनगर में खूब मान-सम्मान और शोहरत मिली है।

अपने पिता की मदद से ये दोनों अपने परिवार की जीविका चलाने के लिए खूबसूरत और डिजाइनदार गद्दे और कंबल बनाते हैं। इसके अलावा ये सोफा कुशन, तकिया भी बनाते हैं। इनका काम ग्राहकों को खूब पसंद आता है यही कारण है कि इन्हें थोक में लोगों के ऑर्डर मिलते हैं। थोक मार्केट के अलावा होलसेलर मार्केट और ग्राहकों सभी लोगों के लिए ये फेवरेट बन चुके हैं।

ये तेली भाई नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हैंडीकैप देहरादून से पढ़े हैं। यहां पर उन्होंने ब्रेल लिपि और दृष्टिबाधित लोगों के लिए जरुरू होम साइंस की भी पढ़ाई की है। मोहम्मद हुसैन ने बताया कि हम दोनों भाई अपने पिता के साथ काम करते हैं। हम ट्रेनिंग के लिए देहरादून गए थे। आमतौर पर जो दिव्यांग होते हैं उन्हें सड़कों पर भीख मांगते हुए पाया जाता है। लेकिन मेरे पिता भीख मांगने के सख्त खिलाफ थे।

उन्होंने हमें भीख मांगना नहीं सिखाया बल्कि अपने मेहनत और हुनर के बलबूते अपनी खुद की सम्मानपूर्वक जिंदगी जीवन जीना सिखाया। उनके छोटे से दुकान पर जो उनके घर के नजदीक ही है वहां पर ये दोनों भाई कंबल और गद्दे सीने और उस पर एंब्रॉयडरी डिजाइन करने का काम करते हैं।