समाज के समुचित विकास के लिए सत्ता में हमारी भागीदारी भी जरूरी। *वसीम राइन।

 

बाराबंकी। आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के प्रदेश अध्यक्ष वसीम राइन ने केन्द्र सरकार से मांग की है कि पसमांदा मुस्लिम समाज को सरकार में हिस्सेदारी दी जाए, ताकि सरकार में नुमाइंदगी कर समाज स्वयं को तरक्की की राह पर आगे बढ़ा सकें। सत्ता में भागीदारी के बिना किसी भी समाज का विकास आसान नही होता।
प्रदेश अध्यक्ष आज सट्टी बाजार स्थित आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के जिला कार्यालय पर आयोजित वर्चुअल बैठक में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने हमेशा से पसमांदा मुसलमानो के साथ धोखा किया है। आखिर कब तक पसमांदा मुस्लिम समाज का इस्तेमाल वोट बैंक के तौर पर होता रहेगा। उन्होंने साफ तौर पर कहा और मांग की कि अब केन्द्र सरकार को चाहिए कि पसमांदा समाज से सरकार में नुमाइंदगी देकर उसे आगे बढ़ने व फख्र से सर उठाने का मौका दिया जाए। इससे यह समाज न सिर्फ तरक्की करेगा बल्कि सबका साथ सबका विकास का नारा बुलंद करने वाले दल के साथ कदम से कदम मिला कर चल भी सकेगा।
प्रदेश अध्यक्ष वसीम राइन ने स्पष्ट किया कि सत्ता में भागीदारी के बगैर किसी समाज की तरक्की की संभावना शून्य ही रहती है। बात चाहे आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, शैक्षिक विकास की हो या देश के विकास में योगदान की। यह कार्य सत्ता के साथ रहने पर ही सम्भव हैं।
उन्होंने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इस दल ने ही सच्चर कमेटी का गठन किया था। उसी की रिपोर्ट में पसमाँदा मुसलमानो की हालत दलितों से बदतर बताई गई। उसके बाद भी पिछड़े मुस्लिमों के लिए कांग्रेस ने कुछ नही किया। यूपी में मुसलमानो की कुल बीस फ़ीसदी आबादी में सोलह फ़ीसदी आबादी पसमांदा मुसलमानो की है। तथाकथित सेक्युलर पार्टियों ने हिस्सेदारी नही दी। सपा ने 2012 के चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया था कि हमारी सरकार बनी, तो सच्चर कमेटी एवं रंगनाथ मिश्रा कमीशन रिपोर्ट लागू करेंगे, पर सरकार बनने पर मुसलमानो के साथ धोखा करते हुए लागू नही किया। सोलह फ़ीसदी पसमांदा मुसलमानो का वोट लेकर खुद बादशाह बन गए।
प्रदेश अध्यक्ष वसीम राइन ने पसमांदा समाज से जागने उठ खड़े होने को वक़्त की जरूरत बताया और कहा कि अल्पसंख्यक और सेक्युलरिज़्म के भूत ने हमे आज तक सिर्फ हमारा इस्तेमाल किया है। मुसलमानों की 85 फीसद आबादी वाला आज का पसमांदा पिछड़ा मुसलमान जिसे आज तक आगे नही बढ़ने दिया गया है। अपनी सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक और आर्थिक हालत पर ग़ौर करे तो सारी बातें समझ में आ जाएंगी।