भारत के टेस्ट क्रिकेट में हालिया प्रदर्शन ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। टीम इंडिया के मौजूदा कोच गौतम गंभीर के कार्यकाल में नतीजे लगातार नीचे जा रहे हैं, जबकि उनसे पहले सेवारत कोच- रवि शास्त्री और राहुल द्रविड़- टेस्ट क्रिकेट में कहीं अधिक मजबूत और स्थिर परिणाम देते रहे।
पिछले तीन कोचों के आँकड़े बताते हैं कि भारत का टेस्ट ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है और यह गिरावट टीम की रणनीति, तैयारी और चयन पर गंभीर सवाल उठाती है।
गौतम गंभीर: लगातार हार के बीच फीका प्रदर्शन
गौतम गंभीर के टेस्ट कोच बनने के बाद भारत ने 18 टेस्ट मैच खेले, जिनमें से-
- सिर्फ 7 में जीत
- 9 में हार
- 2 मैच ड्रॉ हुए
- जीत का प्रतिशत मात्र 41.17% रहा
ये आँकड़े बताते हैं कि गंभीर के कार्यकाल में टीम का प्रदर्शन न सिर्फ अस्थिर रहा है, बल्कि कई घरेलू मैचों में भी भारत हार का सामना कर चुका है-जो भारतीय टेस्ट इतिहास में दुर्लभ माना जाता था।
उनके कार्यकाल में भारत को-
- न्यूज़ीलैंड के खिलाफ 3-0 से शर्मनाक घरेलू हार,
- ऑस्ट्रेलिया में 3-1 से हार,
- इंग्लैंड के साथ 2-2 की बराबरी,
- और वेस्टइंडीज के खिलाफ 2-0 की जीत मिली।

राहुल द्रविड़: स्थिरता और मजबूत टेस्ट क्रिकेट की पहचान
आँकड़े बताते हैं कि राहुल द्रविड़ के कार्यकाल में भारत का टेस्ट खेल कहीं ज्यादा सुरक्षित और ठोस था।
द्रविड़ के नेतृत्व में-
- 24 टेस्ट खेले
- 14 जीते,
- 7 हारे,
- 3 ड्रॉ,
- और जीत प्रतिशत 58.33%
उनके समय में भारत ने-
- इंग्लैंड के खिलाफ मजबूत श्रृंखलाएँ
- दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ महत्वपूर्ण जीत
- वेस्टइंडीज के खिलाफ एकतरफा प्रदर्शन
किया।
द्रविड़ के नेतृत्व का बड़ा गुण था टीम का संतुलन और विदेशी दौरों पर भी सम्मानजनक प्रदर्शन।
रवि शास्त्री: टेस्ट इतिहास के सबसे सफल भारतीय कोचों में एक
आँकड़े बताते हैं कि रवि शास्त्री का टेस्ट रिकॉर्ड तीनों में सबसे बेहतरीन रहा।
उनके कार्यकाल में भारत ने-
- 46 टेस्ट मैच खेले
- 28 जीते,
- 13 हारे,
- 5 ड्रॉ,
- और जीत प्रतिशत 60.87%
उनके समय में भारत ने-
- ऑस्ट्रेलिया में ऐतिहासिक पहली टेस्ट सीरीज़ जीत (2018-19)
- लगातार दो बार WTC फाइनल
- कई विदेशी दौरों पर मजबूत प्रदर्शन
जैसे कीर्तिमान हासिल किए।
शास्त्री के दौर में टीम इंडिया “फाइटिंग यूनिट” के रूप में जानी जाती थी।
तीनों कोचों का सीधा मुकाबला (दस्तावेज़ आधारित तुलना)
| कोच | मैच | जीत | हार | ड्रॉ | जीत % |
|---|---|---|---|---|---|
| गौतम गंभीर | 18 | 7 | 9 | 2 | 41.17% |
| राहुल द्रविड़ | 24 | 14 | 7 | 3 | 58.33% |
| रवि शास्त्री | 46 | 28 | 13 | 5 | 60.87% |
तालिका साफ तौर पर दिखाती है कि गंभीर का रिकॉर्ड तीनों में सबसे कमजोर है।
क्या गंभीर टेस्ट क्रिकेट के लिए धब्बा साबित हो रहे हैं?
भारत की विश्वसनीयता-खासकर घरेलू टेस्ट मुकाबलों में-गंभीर के दौर में सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है।
हार की बढ़ती संख्या, टीम चयन पर सवाल, घरेलू पिचों पर भी संघर्ष, और बल्लेबाजी में गिरावट बता रही है कि टीम में दिशा और रणनीति की स्पष्ट कमी है।
दूसरी ओर
- शास्त्री के समय भारत दुनिया की सबसे मजबूत टेस्ट टीम थी।
- द्रविड़ के समय टीम में स्थिरता और निरंतरता थी।
- गंभीर के दौर में टीम सबसे ज्यादा अस्थिर दिख रही है।
गौतम गंभीर का कम जीत प्रतिशत, लगातार हार, और टीम की गिरती टेस्ट प्रतिष्ठा आज यह कहने के लिए पर्याप्त है कि वह टेस्ट क्रिकेट के लिए अभी तक उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं।
दूसरी तरफ, रवि शास्त्री और राहुल द्रविड़ न केवल गंभीर से मीलों आगे हैं, बल्कि भारतीय टेस्ट इतिहास में सफलतम कोचों की सूची में शीर्ष पर आते हैं।
भारत को यदि टेस्ट क्रिकेट में फिर से पुरानी बुलंदी चाहिए, तो कोचिंग सेटअप में बड़े फैसले लेना आवश्यक हो गया है।
पिछले कुछ सालों से टीम इंडिया के टेस्ट प्रदर्शन में आई गिरावट का ठीकरा हमेशा रोहित शर्मा और विराट कोहली पर फोड़ा जाता रहा। हर हार के बाद यही कहा जाता था कि टीम का ट्रांज़िशन फेज़ चल रहा है और दोनों सीनियर खिलाड़ियों पर निर्भरता ही बड़ी समस्या है।
लेकिन अब, जब दोनों दिग्गज टेस्ट क्रिकेट से विदा ले चुके हैं, तब भी टीम के खेल में कोई सुधार दिखाई नहीं दे रहा।
इससे एक बात साफ़ होती है, समस्या खिलाड़ियों में नहीं, बल्कि गंभीर की कोचिंग और टीम मैनेजमेंट की दिशा में कहीं न कहीं बड़ी कमी है।
टीम की बॉडी लैंग्वेज, रणनीति, और मैच पढ़ने की क्षमता लगातार कमजोर हुई है, जो सीधे तौर पर कोचिंग की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है।