
इन दिनों वर्चुअल रैली की चर्चा हर तरफ है हाल ही में अमित शाह की वर्चुअल रैली थी जो की खूब चर्चा में रही। देश के गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार के आगामी चुनावों को देखते हुए बड़े पैमाने पर वर्चुअल रैली की, जिसमे करीब 5 लाख कार्यकर्ताओं की मौजूदगी देखी गई। वर्चुअल रैली के बाद से ही चुनावी रैलियों के डिजिटल होने को लेकर चर्चा जोरो में है। अब जेहन में प्रश्न ये उठता है की ये वर्चुअल रैली क्या है? और ये कैसे कारगर साबित होगी ? हालांकि भारत में मीडिया और इंटरनेट का फैलाव कितना बड़ा है और राजनीति के डिजिटलीकरण से कौन सी आबादी चुनावी अभियानों से जुड़ पाएगी ये बड़ा सवाल है। भारत में एक तरफ डिजिटल क्रांति का दौर है तो दूसरी तरफ गरीबी, अशिक्षा का भी समावेश है जिसके कारण कई इलाकों तक कई सुविधाओं की पहुंचना संभव नहीं हो पता है।
चुनावी रैलियों की भूमिका अहम :
भारत आबादी के हिसाब से सबसे बड़े लोकतंत्र (Democracy) है। भारत में चुनावी अभियान की बात की जाए तो चुनावी रैलियाँ अहम भूमिका निभाती है। रैली के ज़रिये बड़े जनसमूह के सामने नेतागढ़ अपनी बातो को रखते है। बड़े जनसमूह के दिलो दीमक में खुद को प्रभावशाली बनाना हो या वादे गिनवाना हो हर तरह की बात रैलियों की जरिये संभव हो पाती है। हालांकि कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे को देखते हुए फ़िलहाल के लिए जनसमूह को इकट्ठा कर रैली करना किसी खतरे से काम नहीं है। इसी खतरे को देखते हुए अब राजनीतिक पार्टियां डिजिटल या वर्चुअल रैली (Virtual Rally) का रुख कर रही हैं। वर्चुअल रैली में रियल टाइम इवेंट के तहत न केवल आयोजन किया जा रहा है बल्कि कुछ ब्रांड और कंपनियां प्लानिंग और टाइमलाइन ट्रैकिंग जैसी सेवाएं भी दे रही हैं। इसमें वीडियो के साथ ही आप ग्राफिक, पोल अन्य जानकारियों का शुमार कर सकते हैं। कुछ कंपनियां रैली के बाद वर्चुअल रैली में हाज़िरी, गतिविधियों और मेल आदि से जुड़े आंकड़े और डेटा भी मुहैया करवा रही हैं।
भाजपा अभियान के तहत 437 बड़ी रैलियां हुई :
रिपोर्ट के आकड़ो के अनुसार साल 2014 के चुनावों के सिलसिले में नरेंद्र मोदी ने भाजपा अभियान के तहत 437 बड़ी रैलियां की थीं और कुल 5827 जन समारोहों में शिरकत की थी। वहीं, 2019 चुनावों के मद्देनज़र कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी से ज़्यादा रैलियां की थीं। इन रैलियों में हज़ारों लोग वास्तविक रूप से जुटते रहे और टीवी पर लाखों करोड़ों लोगों तक नेताओं की पहुंच रही। अब वर्चुअल रैलियों की सीमाओं और तकनीकों के बारे में जानते हैं।
रैलियाँ डिजिटलीकरण का रुख कर रही :
कोरोना के प्रसार को देखते हुए रैलियाँ डिजिटलीकरण का रुख कर रही है। अमित शाह बिहार के बाद अब ओडिशा में वर्चुअल रैली करने वाले है। वही दूसरी पार्टियाँ जिनमे तृणमूल कांग्रेस और बिहार की क्षेत्रीय पार्टियों ने भी वर्चुअल रैलियों के बारे में विरोध करना शुरू कर दिया है। भाजपा सहित अन्य कुछ राजनीतिक पार्टियों का मानना है कि अगर कोविड महामारी संबंधी संक्रमण के हालात ऐसे ही रहे तो वास्तविक रैलियां हो पाना मुश्किल ही होगा। हालांकि राजनितिक पार्टियाँ डिजिटलीकरण की नै तकनीकों और विचारो को लेकर रणनीतियां तैयार कर रही है। सोशल मीडिया पर न केवल खर्च किया जा रहा है बल्कि डेटा विश्लेषण पर विमर्श हो रहा है। वहीं, पार्टियां अपने ग्रामीण कार्यकर्ताओं तक को टेक सैवी पहुंचने की कोशिश कर रही हैं।
वर्चुअल रैलियों का दायरा :
गौरतलब है की राजनितिक पार्टियाँ आने वाले समय में वर्चुअल रैलियों का दायरा बढ़ा सकती है। जिसमे इन रैलियों को टीवी पर भी प्रसारित किए जाने की योजनाएं हो सकती हैं। दूसरी तरफ, इनकी सीमाओं के बारे में स्पष्ट है कि पहले तो ये रैलियां अभी तक एकतरफा संवाद हैं और दूसरी तरफ, बहुत खर्चीली साबित हो रही हैं। आपको बता दे, अमित शाह की बिहार में हालिया वर्चुअल रैली की कीमत तक़रीबन 144 करोड़ रुपए रही। राज्य के 72 हज़ार बूथों के कार्यकर्ताओं तक शाह का संवाद पहुंचाने के लिए हज़ारों की संख्या में एलईडी स्क्रीनों और स्मार्ट टीवी इंस्टॉल कराए गए।
अनुमान लगाया जा रहा है की टीवी के साथ ही रेडियो के राष्ट्रीय चैनलों का इस्तेमाल सत्ताधारी पार्टी के हाथ में रहेगा और निजी चैनलों या रेडियो एफएम के ज़रिये अन्य पार्टियां वर्चुअल कैंपेनिंग कर सकती हैं। चूंकि अभी वर्चुअल रैली का खर्च बहुत ज़्यादा होगा इसलिए संचार माध्यमों के चतुराई भरे इस्तेमाल से बाज़ी जीती जा सकती है। स्मार्टफोन के ज़रिये पार्टियां करोड़ों लोगों तक पहुंचने की रणनीति बना सकती हैं। वॉट्सएप सहित मैसेंजर, वीडियो कॉल और मीटिंग एप्स का प्रयोग किया जा सकता है।
वर्चुअल चुनावी अभियानों पर टिका भविष्य :
गौरतलब है की बघारत में चुनावी रैलियों का भविष्य वर्चुअल चुनावी अभियानों पर टिका है। चुकी यह अभियान बड़े तौर पर सिर्फ शहरी वोटरों तक की पहुंच में ही होगा। हालांकि अभी ज़ूम क्लाउड, गूगल मीट्स जैसी तकनीकों से वीडियो मीटिंग या संवाद किया जा रहा हैं लेकिन रैलियों के लिए और बेहतर मंच जुटाने की ज़रूरत बनी हुई है ताकि रैलियों का खर्च कम किया जा सके। फ़िलहाल आने वाले दिनों में यह साबित हो जायेगा की राजनीतिक पार्टियों का डिजिटलीकरण कितना कारगर साबित हुआ है । साथ ही जनता तक पहुंचने वाला उनका हक़ कितने हद तक उन तक पहुंच पाया है।